प्रशंसा, अनुशंसा, पारितोषिक कलाकार का लक्ष्य, स्वभाव तथा साध्य है। संगीत कलायें प्रारम्भ से ही राजश्रय या धनाढ्य जनाश्रय पर आश्रित है। समय परिवर्तन के साथ-साथ यह स्थान, सरकार तथा सरकारी तंत्र ने ले लिया इस आशा के साथ कि संस्कृति के बिना नयी पीढ़ी आगे नहीं बढ़ सकती। परम्परा के बिना धरोहर नहीं हो सकती। अस्तु, बात सोलह आने सही है।
संस्कृति विभाग, संगीत नाटक अकादमी, उत्तर/पश्चिमी/दक्षिणी/पूर्वी सांस्कृतिक केन्द्र इत्यादि वर्तमान में सांस्कृतिक गतिविधियों के तथाकथित सरकारी तंत्राश्रय हैं जो कि सांगीतिक धरोहरांे को लुप्तप्राय होने से बचाने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
अक्टूबर 2014 में लगभग 11 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने ‘‘अकादमी पुरस्कारांे’’ की घोषणा की। अखबार देखकर ऐसा लगा कि पुरस्कार नहीं रेवड़ियाँ बंट रहीं है। भाई-भतीजावाद भी चला और जातिवाद भी। अब ‘‘वाद’’ परम्परा मंे कुछ तो सही कलाकारों का चुनाव हुआ परन्तु कुछ अपनी पसंद के चलते भी पंक्तिबद्ध हो गये। कुछ ऐसे भी हैं जो आजतक कभी मंच पर अपनी प्रस्तुति भी न दे पाये परन्तु अकादमी पुरस्कार से सुशोभित हो गये।
Nagar, Vidhi. "Swachta Abhiyan – Sanskritik Puruskaro Me." Sangeet Galaxy, January 2015, pp. 2-2.