उत्तराखण्ड की विशिष्ट लोक गायन शैली-‘झोड़ा/खेल’

Abstract

हमारेदेश केविविन्न िागों मेंवनिास करनेिालेमानि समूहों मेंउत्सिों, मेलों तथा माांगवलक कार्यों केसमर्य नत्ृर्य ि गार्यन द्वारा मनोरांजन करनेकी परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही ह.ैउत्तराखण्ड िी इस परम्परा सेअछूता नहीं है. प्राचीन समर्य मेंलोग वमलजुल कर रहते थे. अतः प्राचीन रीवत-ररिाजों में हमें सामूवहक सांस्कृवत देखनेको वमलती ह.ै इसी सामूवहक सांस्कृवत की एक अद्भुत शैली है- ‘झोड़ा अथिा खेल’. र्यह मुक्तक ि प्रबांधात्मक गीतों के अांतगतग मेलक गीतों की श्रेणी में आते हैं. र्यह उत्तराखण्ड की प्रमुख गार्यन शैवलर्यों में से एक है. झोड़ा शैली में गार्यकी के साथ-साथ नत्ृर्य िी सवम्मवलत हैं. इसका चलनउत्तराखण्ड केलगिग सिी क्षेत्रों मेंदेखा जाताह.ैकुमाऊँमेंझोड़े को कई नामों से सम्बोवधत वकर्या जाता है, जैसे- झोड़ा, झ्िाड़ा, झिाड़, ज्िड़, हथजोड़ा तथा खेल आवद. 1 इसका मूल वहन्दी के‘जोड़ा’ शब्द से वलर्या गर्या है वजसका अथग है- जोड़ना र्या वमलाना. कुमाऊँनी िाषा में‘जोड़ा’ शब्द को ‘ज्िड़’ कहा जाता है, जैसे-दल्ुहा-दल्ुहन केजोड़ेको ‘बर-ब्र्योली ज्िड़’ कहतेह.ैंप्रत्र्येक व्र्यवक्त कादसूरेव्र्यवक्त केहाथों केसाथ अनूठा बांधनहोताह.ैअतः जोड़कर गार्ये जाने के आधार पर ही र्यह विधा ‘झोड़ा’नाम से विख्र्यात है. इस विधा को देश के विविन्न िागों मेंविन्न-विन्न नामों सेपुकारा जाता ह.ैउत्तराखण्ड केपूिी सीमान्त क्षेत्र में इस प्रकार केनत्ृर्य-गीत की विधा को ‘खेल’, अल्मोड़ा, रानीखेत, नैनीताल आवद क्षेत्रों में इसे ‘झोड़ा’, द्वाराहाट में ‘विड़च्र्यप’ू 2 , दनपुर में‘चाँचरी’, नेपाल में ‘दोहरे’ के नाम से जाना जाता है. अल्मोड़ा वजले के सोमेश्वर, गेिाड़ ि बोरारो घाटी के झोड़ेबहुत प्रवसद्ध ह.ैंहुड़का, ढोल ि दमाऊँ का प्रर्योग झोड़ा शैली में ताल-िाद्य के रूप में वकर्या जाता है.3 प्रस्ततु शोध-पत्र में ‘झोड़े’ पर विस्तार सेअध्र्यर्यन करनेि कुछ झोड़ों को स्िरवलवपबद्ध करने का प्रर्यास िी वकर्या गर्या है.

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Citation

पाण्डे, रीता. "उत्तराखण्ड की विशिष्ट लोक गायन शैली-‘झोड़ा/खेल’." Sangeet Galaxy, vol. 13, no. 1, January 2024, pp. 162-170.

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