भावों की अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है संगीत। ह्दयगत भावों को व्यक्त करने में जब शब्द असमर्थ हो जाते हैं तब संगीत रूपी साधन से हम अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं। संगीत अर्थात् गायन, वादन तथा नृत्य की त्रिवेणी में सराबोर होकर प्रत्येक व्यक्ति के ह्दय को आनन्दानुभूति होती है। किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक करने के लिए सर्वप्रथम एक योजना बनाई जाती है। सफलतापूर्वक शिक्षा प्रदान करने हेतु भी हम एक योजना बनाते हैं। इसी योजना को हम शिक्षण-पद्धति के रूप में परिभाषित करते हैं।
संगीत शिक्षा प्रदान करने हेतु प्राचीन काल में गुरू-शिष्य परम्परा अपनाई जाती थी। इस परम्परा के अन्तर्गत शिष्य गुरूकुल में रहकर ज्ञान प्राप्त करते थे। वर्तमान समय में संस्थागत शिक्षण-पद्धति अपनाई जाती है। इसके अन्तर्गत शिष्य एक निश्चित शिक्षण-संस्था में जाकर ज्ञान प्राप्त करते हैं। नवीन संगीत शिक्षण-पद्धति यद्यपि एक बहुआयामी पद्धति है। इसमें छात्रों को विविध घरानों की गायन, वादन शैलियों का ज्ञान प्रदान किया जाता है तथापि इसमें कुछ विसंगतियां है। इसमें चक्रावधि निश्चित होने से अभ्यास का क्रम बीच में तोड़ना पड़ता है। इस पद्धति में गुरूओं द्वारा कला-प्रदर्शन ज्यादा नहीं किया जाता, साथ ही साथ आंचलिक संगीत, चित्रपट संगीत, कार्यशालाओं का आयोजन एवं पाठ्यक्रम में विविधता आदि की भी संस्थागत पद्धति में उपेक्षा की गई है जिस कारण छात्रों के सांगीतिक ज्ञानवर्द्धन का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। अतः छात्रों में संगीत के प्रति प्रेम जाग्रत करने हेतु तथा समाज को योग्य संगीतज्ञ प्रदान करने हेतु नवीन संगीत शिक्षण पद्धति के उपरोक्त वर्णित स्याह पहलुओं को समाप्त करना अत्यावश्यक है।
Bhadoria, Alka. "Sangeet Ki Sansthagat Shikshan Paddhati: Ek Vishleshnatmak Addhyan." Sangeet Galaxy, January 2017, pp. 52-55.