प्रत्येक संस्कृति और विरासत की पृष्ठभूमि को जानने के लिए मुख्य स्रोत के रूप में उस संस्कृति से संबंधित ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक होता है. भारतीय सभ्यता और संस्कृति में संगीत का उल्लेखनीय स्थान है. भारतीय परंपरा में संगीत को गुरुमुखी शिक्षा का स्थान प्राप्त है. आरम्भ से ही संगीत की शिक्षा गुरु शिष्य परंपरा के पवित्र बंधन के अनुसार प्रवाहित होती रही है. इसमें कोई शक नहीं है कि गुरु शिष्य परम्परा में संगीत का क्रियात्मक पहलू प्रबल रहा है. संगीत, बेशक एक क्रियात्मक कला है, लेकिन सैद्धांतिक पहचान के बिना किसी भी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा के अस्तित्व को खोने का खतरा है. इसलिए संगीत कला की पहचान और अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अनेक संगीत गुरुओं, लेखकों, चिंतकों, और विद्वानो ने संगीत के क्षेत्र में प्रकाशन का कार्य किया जिसके ऐतिहासिक विकास की चर्चा प्रस्तुत शोध पत्र में की गयी है.
Virk, Rishipal Singh. "Bhartiya Sangeet ke Prakashan ka Itihas aur Vikas (Panjabi Bhasha ke Vishesh Sandarbh me / (भारतीय संगीत के प्रकाशन का इतिहास और विकास (पंजाबी भाषा के विशेष संदर्भ में)." Sangeet Galaxy, vol. 12, no. 1, pp. 126-131.