शुद्ध, छायालग एवं संकीर्ण पद्धति से मिश्र रागों का अंतर्संबंध

असिस्टेंट प्रोफेसर, गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज आर. एस. पूरा., जम्मू

Email:  rakeshkalotra21@gmail.com

सारांश

विश्व में पांच मूल तत्व – पृथ्वी, अग्नि, वायु, वरुण एवं आकाश है इनके मिश्रण से ही सम्पूर्ण प्रकृति का निर्माण हुआ है, इसी प्रकार रागों के असंख्य रूप भी शुद्ध रागों के मिश्रण पर आधारित है. मूल तत्वों का शुद्ध रूप हमेशा निमित मात्र में ही होता है तथा उनके विभिन्न मिश्रणों द्वारा ही अनगिनित रूपों की प्राप्ति होती है. एक राग में दुसरे राग का मिश्रण होने से जिन रागों का सृजन होता है उन्हें छायालग रागों की श्रेणी में स्थान दिया जाता है. इन रागों के मिश्रण की प्रक्रिया में दो अलग-अलग थाटों से जन्य रागों को मिश्रित कर एक नवीन राग का निर्माण किया जाता है परन्तु दोनों रागों का मिश्रण कुछ इस प्रकार से किया जाता है कि मिश्रित किये गए रागों की केवल छाया मात्र दिखाई दे, परन्तु फिर भी उन मिलाये हुए रागों से छायालग का स्वरुप कुछ अलग ही प्रतीत हो, इसी प्रकार संकीर्ण रागों में शुद्ध एवं छायालग दोनों का मिश्रण होता है अर्थात इसमें दो से अधिक रागों का मिश्रण देखने को मिलता है अतः  इसी कारण बहुत से विद्बान मिश्र रागों का सीधा संबंध शुद्ध छायालग एवं संकीर्ण पद्धति से जोड़ते है.

मुख्य शब्द : सृजन, निमित मात्र, मिश्रण, शास्त्रोक्त रीति, रंजकतत्व

How to cite this paper:

Kalotra. Rakesh. 2024. “Shuddha, Chhayalag Evam Sankeern Paddhati se Mishra Ragon ka Sambandh.” Sangeet Galaxy 13(1): 195-199. www.sangeetgalaxy.co.in.

भारतीय संगीत के इतिहास का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि समय समय पर राग वर्गीकरण की कई पद्धतियां प्रचार में रहीं जिसमें कभी रागों का वर्गीकरण भाव के आधार पर किया गया, कभी गायन समय के आधार पर तथा कभी ग्राम व मूर्च्छना के आधार पर, परन्तु इन सभी वर्गीकरण के आधारों के अतिरिक्त एक अन्य राग वर्गीकरण को विशेष मान्यता प्राप्त थी जो शुद्ध, छायालग एवं संकीर्ण के नाम से प्रचलित था रागों के रूप में यह वर्गीकरण प्राचीन

समय से आज तक क्रमशः चलता ही रहा है. शुद्ध, छायालग व संकीर्ण रागों का वर्गीकरण मतंग मुनि के समय से ही प्रचलित है अर्थात यह एक प्राचीन प्रणाली है. उपर्युक्त कथन का प्रमाण हमें मतंग कृत ब्रुह्देशी में प्राप्त होता है. नारद

कृत ग्रन्थ “संगीत मकरन्द” के अनुसार राग के तीन भेद है जो शुद्ध, छायालग तथा संकीर्ण के नाम से जाने जाते हैं जिसमें पूर्णतया शास्त्रोक्त रीती से गाने बजाने पर आनंद प्राप्त होता है उन्हें शुद्ध राग कहा जाता है.

इन रागों को विस्तार के लिए किसी अन्य रागों की आवश्कता नहीं होती. छायालग रागों में दो रागों का मिश्रण कर उन्हें रंजकतत्व प्रदान किया जाता है तथा संकीर्ण रागों में शुद्ध, छायालग दोनों का मिश्रण होता है.

13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में पंडित शारंगदेव  द्वारा रचित ग्रन्थ ‘संगीत रत्नाकर’ में शुद्ध छायालग रागों के वर्गीकरण का तो कोई वर्णन प्राप्त नहीं होता परन्तु इसी ग्रन्थ के प्रकीर्णकाध्याय के अंतर्गत गायक के गुण-अवगुण की चर्चा करते हुए, शुद्ध छायालग शब्दों का प्रयोग अवश्य पाया गया है. (1)

पंडित दामोदर द्वारा रचित ग्रन्थ ‘संगीत दर्पण’ में रागों को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है – शुद्ध, छायालग व संकीर्ण

तत्र शुद्धरागत्वं नाम शास्त्रोक्त नियमात-रंजकत्वं भवति. (2)

अर्थात शुद्ध राग उसे कहते है, जिसे पूर्णतय शास्त्रोक्त रीती से गाने पर आनंद प्राप्त होता है, छायालग में दो रागों का मिश्रण करके उसे रंजक रूप प्रदान किया जाता है तथा संकीर्ण में शुद्ध तथा छायालग दोनों रागों का मिश्रण होकर आनंद प्राप्त होता है.

आचार्य पार्शवदेव द्वारा रचित जैन ग्रन्थ जिसका हिंदी अनुवाद आचार्य बृहस्पति द्वारा किया गया के अंतर्गत भी शुद्ध रागों के विषय में कुछ जानकारी प्राप्त होती है. शुद्ध और सालग रागों में विषयम और प्रांजल सूड का रचयिता उत्तमोत्तम, पूर्वोक्त दोनों प्रकार के रागों में विषयम सूड का कर्ता उत्तमाधम होता है. विभिन्न रंगों से युक्त वस्त्र रंग-बिरंगा होता है, उसी प्रकार कोई धुन चित्र (रंग-बिरंगे, संकीर्ण) राग से युक्त होती है. (3)

फकीरुल्लाह के अनुसार शुद्ध रागों की संख्या कुल 6 मानी गई है, जिनके नाम भैरव, मालकोंस, हिंडोल, दीपक, श्री तथा मेघ है. शुद्ध, छायालग रागों से संबंधित कुछ विवेचन हमें संस्कृत तथा फारसी ग्रंथों में भी प्राप्त होता है. फकीरुल्लाह द्वारा रागों के शुद्ध-महाशुद्ध भेदों का भी विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है तथा शुद्ध व  महाशुद्ध रागों

के सृजन में प्रयुक्त किए गए स्वरों का भी विवेचन किया है,जैसे – केवल शुद्ध स्वरों के प्रयोग से उत्पन्न राग को ‘महाशुद्ध’ राग की तथा विकृत स्वरों के प्रयोग द्वारा उत्पन्न राग को ‘शुद्ध राग’ की संज्ञा दी गई है.

‘संगीत दामोदर’ नामक ग्रन्थ के अंतर्गत शुद्ध रागों की संख्या कुल 20 बताई गई है किन्तु इन रागों का कोई विस्तृत वर्णन नहीं किया गया. शालग प्रकार के रागों का विस्तृत रूप से वर्णन किया है, और चौदह प्रकार के संकीर्ण

रागों का उल्लेख किया है. मध्यकाल के कुछ अन्य ग्रंथकारों ने भी इसी प्रकार के वर्गीकरण (शुद्ध, छायालग, व संकीर्ण) को स्वीकृति दी है. (4)

पंडित लोचन कृत ‘राग तरंगिणी’ के अंतर्गत भी कुछ मिश्र एवं संकीर्ण रागों का उल्लेख मिलता है. रागों का यही वर्गीकरण भावभट्ट  द्वारा लिखित ग्रन्थ ‘अनूप संगीत विलास’ में भी प्राप्त होता है. (5)

‘तोहफत-उलहिन्द’ ग्रन्थ में शुद्ध, छायालग तथा संकीर्ण रागों का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है – छायालग को लोक भाषानुसार ‘सालग’ कहा जाता है, जिस प्रकार शुद्ध रागों के ‘शुद्ध’ व ‘महाशुद्ध’ भेद है , उसी प्रकार संकीर्ण रागों के भी ‘संकीर्ण’ व ‘महासंकीर्ण’ जैसे भेदों का विवेचन किया गया है.  इस ग्रन्थ में 150 संकीर्ण रागों के नाम दिए गए हैं तथा हज़रत अमीर खुसरों द्वारा बनाए गये 12 रागों का उल्लेख भी इसी ग्रन्थ में मिलता है.

17वीं शताब्दी में पंडित सोमनाथ द्वारा लिखित ग्रन्थ ‘राग विबोध’ के अंतर्गत भी शुद्ध, छायालग व संकीर्ण रागों का वर्णन किया गया है, उनके अनुसार शुद्ध रागों को अपना स्वरुप निर्धारण करने हेतु किसी अन्य राग की आवश्यकता नहीं होती, छायालग रागों में किसी एक अन्य राग की छाया विद्धमान होती है और संकीर्ण रागों में अनेक रागों का मिश्रण पाया जाता है.

रागों के उक्त वर्गीकरण के संबंध में पंडित भातखंडे जी ने ‘क्रमिक पुस्तक मलिका’ में स्पष्टीकरण दिया है, जो निम्नलिखित है –

जो राग केवल शास्त्रोक्त राग-लक्षणों एवं नियम-उपनियमों के अनुसार शुद्धता सहित गाया – बजाया जाता है, व जिसमें रंजन करने की क्षमता होती है उसे ‘शुद्ध’ राग कहा जाता है. शुद्ध रागों में अन्य रागों की अपेक्षा स्वतन्त्र एवं शुद्ध अस्तित्व दिखाई पड़ता है.

शुद्ध रागों की श्रेणी में दस थाटों की श्रेणी से निर्मित अनेक रागों को अंकित किया जा सकता है जैसे – यमन, भैरव, बिलावल, भैरवी, तोड़ी, श्री, बसंत,सारंग आदि. इन रागों में प्रयोग होने वाले स्वर-विन्यास, कण, मींडयुक्त स्वरोच्चारण, अनेक स्वर- युगल, सम्वाद आदि राग लक्षणों युक्त प्रक्रियाएँ इनकी अपनी उपज समझी जाती है.(6)

विदुषी श्रीमती सुमति मुटाटकर जी का कहना है –

शुद्ध रागात्वं नाम शास्त्रनियमनतिक्रमेण स्वरोरक्ति हेतुत्वम.

अर्थात ऐसे राग जिनमें किसी प्रकार की अशुद्धता न हो तथा जो शास्त्र के नियमों का अतिक्रमण न करके अपने आप में रक्तिगुणदायक हों, उन्हें शुद्ध रागों की संज्ञा दी जाती है. (7)

शुद्ध, छायालग व संकीर्ण रागों के बारे में अनेक ग्रन्थकारों के मतों का अध्ययन करने से हमें ज्ञात होता है कि संकलित किए गए सभी विद्वानों के मत लगभग एक से ही प्रतीत होतें है.

निष्कर्ष

 भारतीय शास्त्रीय संगीत की सम्पूर्ण सृजनशीलता और उसका समग्र सौन्दर्य राग पर केन्द्रित है. राग की वर्तमान परिभाषा का बन्धन हटा कर देखें तो मोटे तौर पर प्राचीन जातियाँ भी मूलतः राग ही थीं. यही कारण है कि जातियों के जो भी लक्षण शास्त्रीय ग्रंथों में मिलते है , वही लक्षण थोड़े बहुत अंतर के साथ रागों में भी देखने को मिलते हैं. नए रागों की परिकल्पना में पुराने रागों का कुछ न कुछ आधार अवश्य रहता है. जिस प्रकार जातियों में दो तीन जातियों को जोड़कर विकृता, सुन्सर्गजा आदि नए जाति रूपों का उल्लेख हमारी प्राचीन परम्परा में देखने को मिलता है. उसी प्रकार शुद्ध रागों में किसी अन्य राग की छाया आने से छायालग और शुद्ध और छायालग रागों को मिलाने से संकीर्ण रागों का निर्माण होता है.

उपरोक्त लिखित विद्वानों के अनुसार जिन रागों में अन्य किसी राग की छटा दिखाई दे , वह छायालग राग कहलाते हैं. उदारणार्थ शुद्ध कल्याण में यमन,परज में बसंत, जलधर केदार में दुर्गा, मेघ मल्हार में सारंग, बिलासखानी तोड़ी में भैरवी की छाया दिखाई देती है. इन सब रागों को हम मिश्र रागों की श्रेणी में भी रखतें हैं.  इसी प्रकार जब एक राग में दूसरा राग मिल जाता हैं तब संकीर्ण अथवा मिश्र राग बन जाता है. संकीर्ण अथवा मिश्र रागों में शुद्ध तथा छायालग रागों का मिश्रण होता है जिसमें दो या दो से अधिक रागों का मिश्रण देखनें को मिलता है जैसे – भैरव बहार में भैरव और बहार का मिश्रण व जयंतमल्हार में जयजयवंती और मल्हार का मिश्रण है. इसी तरह धानीकौंस में धानी,

भीमपलासी और मालकौंस के स्वर रहते हैं.  राग खट में सुहा, कान्हड़ा, सारंग, देसी, गांधारी और सुघराई इन 6 रागों का मिश्रण बताया गया है.

इस प्रकार हम देखतें है कि छायालग एवं संकीर्ण  पद्धति का कहीं न कहीं संबंध मिश्र रागों से माना जा सकता है. जिस प्रकार दो या दो से अधिक रागों को विशेष अनुपात में मिश्रित करना ही संकीर्ण राग की विशेषता है उसी प्रकार मिश्र रागों में भी मिश्र किये जाने वाले रागों को एक विशेष अनुपात में रखकर उनका मिश्रण किया जाता है. परन्तु मिश्र किये गए रागों को इस तरह से मिलाया जाता है कि वह अपना एक अलग एवं स्वतन्त्र रूप का निर्माण करते हैं और श्रोताओं के चित्त का रंजन करने में सफल रहतें हैं.