भारतीय धर्मों के प्रचार और प्रसार में संगीत का विशेष महत्व है, इसलिए धार्मिक परम्पराओं का संगीत के विकास में काफी योगदान रहा है.गुरु नानक देव जी ने भी गुरबानी के प्रचार और प्रसार के लिए ‘शब्द कीर्तन’ की शैली को जन्म दिया, इस परंपरा को ‘गुरमत संगीत’ का नाम दिया.गुरमत संगीत हिंदुस्तानी संगीत का अटूट अंग है. यह ग्रंथ अब तक का एकमात्र ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो लगभग पूर्ण रूप से रागबद्ध है. गुरमत संगीत की गायन परंपरा में वारें, अलाहुनियाँ, सिठ्ठनियाँ, पढ़तालें आदि गायन शैलियां हैं, परन्तु कालांतर में इन शैलियों का गायन कुछ खास अवसरों पर ही सुनने को मिलता है.इसका कारण गुरमत संगीत की पूर्ण जानकारी ना होना है. प्रस्तुत शोध पत्र में पिछले कुछ दशकों में गुरमत संगीत की प्रस्तुति में आये बदलावों और गुरमत संगीत का प्रचार और प्रसार कम होने के कारणों को दृष्टिपात किया गया है.
Singh, Karanjit. "Gurmat Sangeet ki Gayan Prastuti me Aaye Badalav: Ek Vishleshan." Sangeet Galaxy, vol. 11, no. 1, pp. 176-182.