चतु: वैष्णव संप्रदाय में निंबार्क संप्रदाय का अपना अलग स्थान एवं महत्व है. सर्वप्रथम इस संप्रदाय द्वारा राधा कृष्ण की युगल उपासना प्रारंभ किया गया. इस संप्रदाय में राधा कृष्ण की सेवा एवं पूजा संगीत के माध्यम से की जाती है. यह परंपरा इस संप्रदाय के आचार्य नारद मुनि द्वारा प्रारंभ हुई और यह अनवरत रूप से आज तक चली आ रही है. यहां नित्य सेवा एवं वार्षिक उत्सव में संगीत के तीनों विधाओं का प्रयोग किया जाता है नित्य सेवा के अंतर्गत श्री राधा कृष्ण की अष्टयाम सेवा आती है जिस प्रकार मनुष्य अपना नित्य क्रिया करता है उसी प्रकार भगवान का भी सेवा इस संप्रदाय ने किया जाता है. प्रातः काल मंगला आरती से लेकर रात्रि कालीन शयन आरती तक यह सेवा की जाती है. जिसमें संगीत के माध्यम से इस संप्रदाय के आचार्यों द्वारा रचित पदों का गायन समय अनुसार रागो के द्वारा किया जाता है . इस संप्रदाय में वार्षिक उत्सव का भी अपना अलग महत्व है. यहां मुख्य रूप से संप्रदाय के आचार्यों का पाटोत्सव, कृष्ण जन्माष्टमी, राधा अष्टमी ,झूला उत्सव आदि उत्सवों को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. इन उत्सवों में संगीत का विशेष महत्व होता है. संप्रदाय के आचार्यों द्वारा रचित उत्सवों के पदों का गायन के माध्यम से विशेष सेवा पूजा की जाती है. इस गायन विधा को इस संप्रदाय में समाज गायन के नाम से जाना जाता है जो प्रायः लुप्त होता जा रहा है. इस शोध पत्र के माध्यम से इस संप्रदाय में अष्टयाम सेवा एवं वार्षिक उत्सव में सांगीतिक प्रयोग की प्रधानता को विस्तार से वर्णित करने का प्रयास किया हैं .
Shukla, Gaurav. "निम्बार्क सम्प्रदाय के नित्य (अष्टयाम) एवं वर्षोत्सवों में सांगीतिक प्रयोग की प्रधानता (Nimbark Sampraday ke Nitya (Ashtayam) Evam Varshotsavo me Saangitik Prayog ki Pradhanta)." Sangeet Galaxy, vol. 11, no. 2, July 2022, pp. 189-202.