भारतीय शास्त्रीय संगीत मेंअनेक प्रकार के वाद्यों का प्रयोग वैदिक काल सेदनरंतर चला आ
रहा है। सभी प्रकार केवाद्यों का अपनाएक दवशेष स्थान ह,ैदकन्तुसभी प्रकार केवाद्यों मेंतंत्
वाद्यों को अग्रणीय माना जाता है। आधुदनक काल मेंतंत्री वाद्यों के िो प्रकार िेखने को दमलते
ह।ैसाररकायुक्त वाद्य एवंसाररकादवहीन वाद्य । वैदिक काल से प्राचीन काल तक भारत में के वल
साररकादवहीन वाद्यों का प्रचलन था, साररकायुक्त वाद्यों का कोई अदस्तत्व नहीं था । लगभग 6वीं शताब्िी में महदषि
मतंग के द्वारा वीणा पर साररकाओं की स्थापना का सफल प्रयोग दकया गया, महदषि मतगं का यह प्रयोग भारतीय
वाद्यों मेंक्ांदतकारी दसद्ध हुआ । मतंग काल सेलेकर आधुदनक काल तक अनेक नवीन साररकायक्तु वाद्यों का
आदवष्कार दनरंतर चला आ रहाहै। आधुदनक काल मेंसाररकयुक्त वाद्योंनेअपनीउपदस्थदत सेभारतीय संगीत को
और भी वैभवशाली बनाया हैतथा सम्पूणिदवश्व मेंभारतीय संगीत केप्रचार-प्रसार में साररकायुक्त वाद्योंनेमहत्वपूणि
भूदमका का दनविहन दकया है।
मिश्रा, वर्षा. "भारतीय संगीत में सारिकायुक्त वाद्य : एक अध्ययन." Sangeet Galaxy, vol. 13, no. 1, January 2024, pp. 182-186.