भारतीय संगीत परंपरा में तबला केवल एक ताल वाद्य नहीं, बल्कि सांगीतिक अभिव्यक्ति, लय-संवेदन और सांस्कृतिक निरंतरता का सशक्त माध्यम है. परंपरागत गुरु-शिष्य पद्धति ने सदियों तक घराना-विशिष्ट शैली, रियाज़ की गहन साधना तथा भावात्मक सूक्ष्मता का संरक्षण किया है, जबकि आधुनिक संस्थागत शिक्षा ने संगीत को व्यवस्थित पाठ्यक्रम, सैद्धांतिक आधार, शोध-अवसर और प्रमाणिकता प्रदान की है. समकालीन परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न उभरता है कि क्या तबला जैसे विषय के समग्र शिक्षण हेतु इनमें से कोई एक पद्धति पर्याप्त है. प्रस्तुत शोध-लेख में गुरुकुल एवं संस्थागत शिक्षण प्रणालियों का तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन करते हुए उनकी विशेषताओं एवं सीमाओं का विवेचन किया गया है. अध्ययन के आधार पर यह स्थापित किया गया है कि परंपरागत आत्मीयता और रियाज़-प्रधान साधना को संस्थागत संरचना, सैद्धांतिक संतुलन एवं शोधपरक दृष्टिकोण के साथ समन्वित करना आवश्यक है. लेख में एक समन्वित (Hybrid) मॉडल की अवधारणा प्रस्तुत की गई है, जो परंपरा-संरक्षण, अकादमिक प्रामाणिकता, रोजगार-संभावनाओं तथा वैश्विक विस्तार, सभी को संतुलित रूप में समाहित कर सके. निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया गया है कि तबला शिक्षा के समग्र एवं प्रभावी विकास हेतु गुरुकुल और संस्थागत पद्धति का सुविचारित समन्वय ही आदर्श दिशा है.
Uddhav, Praveen. "संस्थागत एवं गुरुकुल पद्धति का समन्वय: तबला शिक्षण की आदर्श एवं समग्र दिशा." Sangeet Galaxy 15, no. 2 (2026): 108-115.