सितारनवाज़ उस्ताद विलायत खान के पूर्वज राजपूत क्षत्रिय थे और गायन के लिए जाने जाते थे। क्षत्रिय और राजपूत होने अर्थ यह कि वे हिन्दू थे और अवश्य ही पेशे से योद्धा भी थे। उनदिनों की रीत रिवाज के अनुसार वे अवसर काल में विविध कलाओं की चर्चा करते थे। इस परिवार की रुचि संगीत में थी । कारण यह है कि पुराने जमाने में लोग दिनभर के काम धाम से निवृत्त होकर शाम को संध्या आरती के समय लोकयंत्रों को बजाकर भजन गाते थे या उसके बाद मन बहलाने के लिए अपनी पसंद के गाने गाते थे। उनमें से अगर कोई उम्दा गा बजा लेता था तो मुजरा करने के लिए उसे संगीत रसिकों का निमंत्रण भी मिलता था । ऐसे संगीतज्ञ परिवार के लोगों को अपनी विशेष शैली के कारण किसी खास घराने की कलाकार के रूप में ख्याति प्राप्त हुई । विलायत खान साहब का पितृकुल ग्वालियर, इंदौर और आगरा तथा मातृकुल डागर, अतरौली एवं किराना घराने के कलाकारों के साथ जुड़ा हुआ था। वे कलाकार पहले शौकिया यंत्रवादक हुआ करते थे जिनमें सारंगी और सितार मुख्य था । बाद में इन्होंने सितार वादन में ऐसा दर्ज़ा हासिल किया कि वह इटावा घराना नाम से प्रसिद्ध हुआ। चूँकि सितार पर नवीनता लाने में उस्ताद इमदाद खाँ का बहुत बड़ा योगदान था इसलिए वह शैली और उसकी तकनीक इमदादखानी बाज कहलाने लगी । विलायत खान के बुजुर्गों का मूल निवास ग्वालियर के पास नौगाँव नाम की जगह थी जो वहाँ के जमींदार हुआ करते थे। उस्ताद विलायत खाँ के पूर्वज मलूकदास राजपूत वंशज थे। यह अनुमान किया जाता है कि उन्हीं के खानदान में सरोजन सिंह या सुजान सिंह हुए। उनकी तीसरी पीढ़ी में हुए साहबदाद खान जिनके समय से सितार इनके घर में ज्यादा चमकने लगा। इस परिवार में लोगों ने सितार पर इतनी मेहनत की कि साहबदाद का पुत्र इमदाद और पौत्र इनायत सितार वादन के एक बेमिसाल इतिहास बन गए। इन महान व्यक्तियों के बारे में अनेक भ्रांतिमूलक बातें फैली हुई है । हमारे पास उपलब्ध कहानी और किस्सों पर जब युक्ति तर्क के द्वारा विचार किया जाता है तो वह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ जैसा बन जाता है। हमने वही विश्लेषणात्मक उपलब्धियाँ इस शोधपरक आलेख मे प्रस्तुत किया है ।
Parmar, Nitin and Gourang Bhavsar. "Sitar Nawaz Ustad Vilayat Khan ke Poorvaj: Ek Vishleshanatmak Addhyayan." Sangeet Galaxy, vol. 11, no. 1, pp. 183-190.