भारत-तिब्बत व्यापार पर चर्चा से पूर्व उत्तराखण्ड के संगीत पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की लम्बी परम्परा यहाँ रही है। शास्त्रीय विधा के जानकारों के अलावा उन गुणीजनों की संख्या भी काफी है जो शास्त्र से लोक की ओर मुड़े हैं या नई ही परम्परा को स्थापित करने में सफल रहे।1 यत्र-तत्र बिखरे इतिहास के पन्नों, श्रुतियों-स्मृतियों के आधार पर पता चलता है कि अन्य कलाओं के विकास की तरह इस पर्वतांचल में भी भारतीय शास्त्रीय संगीत का विकास हुआ। विद्वानों-गुणीजनों का एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना तथा राजघरानों द्वारा उन्हें प्रोत्साहित किए जाने का उल्लेख भी यहाँ मिलता है।2 चूंकि हिमालय राज्य उत्तराखण्ड में लोक संगीत की पृष्ठभूमि के साथ बाहर से आने वाली संस्कृतियों का भी समावेश होता रहा है इसलिये यहाँ की होली और रामलीला तक अनूठे अंदाज की बन चुकी हैं।3 इन सबके बावजूद हमें इसकी जड़ों तक जाना चाहिये कि क्या उत्तराखण्ड के सीमान्त तक संगीत था? यदि था तो वह किस प्रकार था? अध्ययन में पता चलता है कि अपनी दिनचर्या के साथ लोगों में मनोरंजन के लिये संगीत था। कृषि-पशुपालन के आलावा व्यापार यहाँ का मुख्य कार्य रहा है, जिसे बहुत ही उद्यमिता के साथ करते हुए अपनी संस्कृति को लोगों ने बचाया। दूरुह और दुर्गम मार्गों पर चलते हुए, प्राकृतिक आपदाओं के बीच संघर्ष करते हुए ढोल-नगाड़ों के स्वरों के साथ आध्यात्म की ओर इन लोगों की रुचि रही है।
Upreti, Pankaj. "Bharat – Tibbat Vyapar ke Bahane Lok Sangeet ki Padtaal." Sangeet Galaxy, January 2019, pp. 34-39.