भारतीय संगीत के शास्त्रकारों की श्रृंखला का आरम्भ भरत से ही माना जाता है। यद्यपि भरत का ‘नाट्य शास्त्र’ मूलतः संगीत का ग्रन्थ नहीं है, पुनरपि इसमें नाट्य निर्दिष्ट संगीत का विश्लेषण ही मूलतः संगीत के विश्लेषण का आधर बना। इसके बाद संगीत-ग्रन्थों की लम्बी श्रृंखला प्राप्त होती है, यथा - नारदकृत ‘नारदीय शिक्षा’, ‘संगीत मकरन्द’, ‘पंचम सार संहिता’, ‘राग सागर’, ‘चत्वारिंशत्रागनिरूपणम्’, दत्तिलकृत ‘दत्तिलम्’, मंतगकृत ‘वृहद्देशी’, सोमेश्वर देवकृत ‘मानसोल्लास’, जगदेकमल्लकृत ‘संगीत चूड़ामणि’, नान्यदेवकृत ‘भरतभाष्यम्’, शारंगदेवकृत ‘संगीत रत्नाकर’, पार्श्वदेवकृत ‘संगीत समयसार’, सुधकलशकृत ‘संगीतोपनिषत्सारोद्धार’, महाराणा कुम्भाकृत ‘संगीतराज’, रामामात्यकृत ‘स्वरमेलकलानिधि’, क्षेमकर्णकृत ‘राग माला’, दामोदर पंडितकृत ‘संगीत दर्पण’, पं0 अहोबलकृत ‘संगीत परिजात’, पं0 लोचनकृत ‘राग तरंगिणी’, श्रीनिवासनकृत ‘रागतत्त्वविवोध’, हृदयनारायणकृत ‘हृदयकौतुक’, ‘हृदय प्रकाश’, व्यंकटमखीकृत ‘चतुर्दण्डीप्रकाशिका’ इत्यादि। इन सभी शास्त्रकारों ने अपने-अपने ग्रन्थ का आरंभ देवी-देवताओं की स्तुति व पूर्वाचार्यों को स्मरण कर किया है, भरत ने ‘नाट्यशास्त्र’ में - ब्रह्मा एवं शिव का स्मरण इस प्रकार किया है-
Singh, Lavanya Kirti. "Bhartiya Sangeet ke Devarishi." Sangeet Galaxy, July 2014, pp. 63-73.