भारत का नक्शा देखते हुए प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ भारत के ह्रदय के एकदम समीप है. यह सर्व ज्ञात है कि उत्तर.. दक्षिण.. पूर्व.. पश्चिम चारों दिशाओं से भिन्न भिन्न समूह.. कबीले यहाँ आ बसे एवं इन सभी के बीच एक अद्भूत सांस्कृतिक आदान प्रदान होता रहा. इसी का प्रतिबिम्ब उभर आता है यहाँ के गीत संगीत में. यह शोधपत्र एक प्रयास है, छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के ताने-बाने को और उनके इर्द गिर्द घूमती जटिल स्वर-लय-शब्द संगतियों को बूझने का.. साथ ही छत्तीसगढ़ी लोकगीत परंपरा भारत की अन्य संगीत परम्पराओं से किस प्रकार जुडी हुई है यह समझने का.
लोकगीत अपने अन्दर केवल एक विशाल संस्कृति ही नहीं संजोए रखते, बल्कि कई महत्वपूर्ण सामाजिक-राजकीय अर्थों को भी उजागर करते हैं. गतकाल को वर्तमान से जोड़ते हैं और ‘लोक’ को भविष्य के सपने भी दिखाते हैं. हर समय एक संक्रमण अवस्था से गुझरने वाली यह गीत परंपरा हमेशा कोई सुखद अनुभव की निर्मिती करें यह आवश्यक नहीं, कई बार यह परंपरा अपनी व्यथा सुनाने को भी गीत रचती है. आज छत्तीसगढ़ी लोकगीत परंपरा किस प्रकार के संक्रमण से गुजर रही है? यह संक्रमण कैसे सांस्कृतिक बदलाव लेकर आया है? लोक मानस इस बदलाव को किस तरह देखता है? ऐसे ही कुछ प्रश्नों को संबोधित कर रहा है.. टटोल रहा है, यह शोधपत्र!
Dubley, Prachi. "Bunavat Evam Banavat, Chhattisgarhi Lok Geeto Ki." Sangeet Galaxy, January 2018, pp. 41-51.