संगीत साधना की विषय वस्तु है। संगीत साधना के लिए विशेष शिक्षण की आवश्यकता ह®ती है। आधुनिक युग में घरानों की परम्परा लगभग 300 साल पुरानी है। घरानों द्वारा ही सांगीतिक पैतृक सम्पत्ति को सुरक्षित रख पाना सम्भव हो सका है।
गुरू द्वारा दिये गये विशेष प्रकार के ज्ञान को शिष्य अपने शिष्यों को, फिर शिष्य अपने-अपने शिष्यों को देकर उस विशेषता को कायम रखते है, तो ऐसी गुरू शिष्य परम्परा ही ‘घराना’ का रूप ले लेती है। घराने के लिए एक ही परम्परा का कम से कम तीन पीढ़ियों तक कायम रहना आवश्यक है।
प्रो0 रमण लाल मेहता के अनुसार ‘‘भारतीय संगीत के संदर्भ में पारिवारिक परम्परा (घराना) का महत्वपूर्ण स्थान है। इस देश में अनेक हुनर और कलायें है, जिन्हें आज भी जातियों और परिवारों ने अपने निश्चित दायरे में सुरक्षित रखा है। इन दायरों के फलस्वरूप, भारत की कलाओं की सुरक्षा हजारों वर्षों से होती चली आ रही है। इसके फलस्वरूप इस प्रणाली द्वारा अनेक उत्तम, अमूल्य, कलाओं की सुरक्षा हुई है। इसी प्रकार संगीत की कुछ विशिष्ट परम्परा, किसी विशिष्ट परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित और विकसित होती चली जाती है। ऐसी परम्परा को घराना नाम दिया जाता है।
Gupta, Ruchi Rani. "Gharano ki Prasangikta." Sangeet Galaxy, January 2016, pp. 25-27.