संगीत और काव्य दोनों नादाधारित कलाएं है। संगीत स्वर प्रधान है, काव्य शब्द प्रधान। दोनों के मूल में नाद है। भाव दोनों का प्राण है। काव्य और संगीत दोनों एक दूसरे से इतनी गहराई से जुड़े है कि इनको अलग करना कला की आत्मा को नष्ट करने जैसा होगा। संगीत अर्थबोध के लिए काव्य का सहारा लेता है और काव्य प्रभाव वृद्धि के लिए संगीत का।1 पं0 ओंकारनाथ ठाकुर के अनुसार- मेरी दृष्टि में ककरादि व्यंजनों के साथ अकरादि व्यंजनों का जो संबंध है, देह के साथ आत्मा का जो संबंध है, वही संगीत का कविता से संबंध है।2 डॉ0 शरतचंद्र श्रीधर परांजपे कहते है - संगीत नाद प्रधान साहित्य है और साहित्य शब्द प्रधान संगीत है।3 कार्लाइल के शब्दों में- संगीतमय विचार काव्य है। कवित्री महादेवी वर्मा काव्य को सार्थक शब्द समूह और संगीत को लयप्रधान ध्वनि समूह मानती है।4 कह सकते है कि संगीतमय कविता और काव्यात्मक संगीत ही पूर्णरूप में कविता या संगीत कहे जाने के अधिकारी है।5 जहाँ संगीत का मधुर नाद आनंदमग्न कर देता है वहीं काव्य की कोमलकान्त पदावली और मधुर भावों की योजना श्रोता को आनंदित कर देती है।
Verma, Amit Kumar. "Hindi Sahitya Ke Chhayavadi Kaviyo Ka Sangeet Prem." Sangeet Galaxy, January 2017, pp. 28-35. https://doi.org/10.67585/SG.v6.i1.2017.28-35