18वीं से 20वीं सदी के दौरान गुजरे जमाने में जब गुरू शिष्य परम्परा पर आधारित घरानेदार शिक्षण का कोई दूसरा विकल्प नहीं था, तब ये माना जाता रहा कि संगीत एक प्रदर्शनकारी कला है और इसकी शिक्षा में शास्त्रीय अध्ययन और वैज्ञानिक विवेचन की आवश्यकता नही है। संगीत तो सीना-ब-सीना तालीम की चीज है, लेकिन 20वीं सदीं आते-आते समय और सोच दोनों ने करवट ली। संगीत के कुछ बुद्धिजीवियों को संगीत की संस्थागत शिक्षण की जरुरत महसूस होने लगी, फलस्वरूप संगीत की संस्थाओं की स्थापना के प्रयास आरम्भ हो गये। कालान्तर में संगीत की संस्थायें स्थापित हुई। संगीत शिक्षण की नीतियां बनी। पाठ्यक्रम निर्धारित किये गये और किताबें लिखी जाने लगी। संगीत को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिहाज से संगीत लिपियां प्रकाश में आई। जो संगीत अब तक परम्परागत तरीके से मौखिक रूप से प्राप्त होता था अब लिपिबद्ध होने लगा था। इसी क्रम में संगीत पत्रिकाओं के प्रकाशन की शुरूआत हुई। पं0 विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने स्वयं सन् 1905 में लाहौर से ’संगीतामृत प्रवाह’ नामक संगीत पत्रिका प्रकाशित की थी। स्पष्ट है कि स्वतंत्रतापूर्व काल में ही संगीत लेखन के क्षेत्र में जागरूकता आ गई थी, जिसके फलस्वरूप कुछ संगीत पत्रिकाओं का प्रकाशन आरम्भ हो गया था।
Editor-In_chief. "Kuch mere Antarman ki..." Sangeet Galaxy, no. 1, October 2012, pp. 1-5.