होली का पर्व वस्तुतः हर्ष, उल्लास और ऋतु परिवर्तन का ही पर्व है जो भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी मनाया जाता है। उल्लास और मनोरंजन को जन सामान्य होलिका और प्रहलाद के प्रसंग से जोड़कर देखता है, किन्तु होली त्यौहार में मनोविनोद, गीत-संगीत, मिलना, रंग खेलना एक पक्ष है और होलिका दहन दूसरा। उमंग और मनोरंजन के इस त्यौहार की अपनी आंचलिकता भी है। जो इसके संगीत में प्रकट होती है। कुमाऊँ में होली की दीर्घ परम्परा है और यहाँ होली गीत गायन के दो प्रकार हैं- खड़ी होली और बैठकी होली। खड़ी होली ग्रामीण अंचल की ठेठ सामुहिक अभिव्यक्ति है, जबकि बैठकी होली को नागर होली भी कहा जाता है।1 बैठकी होली शास्त्रीय संगीत की बैठकों की तरह होते हुए भी लोकमानस से इस प्रकार जुड़ी हैं कि उस महफिल में बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति उसमें अपने को कलाकार/गायक मानता है। यानी कि मंच और दर्शक/श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं होती है। विभिन्न रागों से सजी होली बैठकी की इस परम्परा में अनगिनत गीत हैं जिन्हें श्रुतियों से पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जा रहा है।
Utpreti, Pankaj. "Kumau Ke Shastriya Holi Geet." Sangeet Galaxy, January 2016, pp. 18-21.