उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में होली गायन की एक समृद्ध संगीत परम्परा वर्षों से प्रचलित है. पौष माह के प्रथम रविवार से कुमाऊँ में होली बैठकें शुरू हो जाती हैं तथा फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ इनका समापन होता है. कुमाऊँनी होली के तीन स्वरूप हैं- खड़ी होली, बैठकी होली तथा महिला होली, खड़ी तथा बैठकी होली को स्थानीय बोली में क्रमशः 'मोटी होली' व 'मसिण (बारीक) होली' भी कहते हैं. खड़ी होलियाँ, बैठकर व खड़े होकर दोनों प्रकार से गायी जाती हैं, चूँकि इनकी भाषा अधिकांशतः 'ब्रज' है तथा अतः कहा जा सकता है कि यह विधा कुमाऊँनी तथा ब्रज भाषी क्षेत्रों की संस्कृतियों के सम्मिश्रण का प्रतिफल हैं. बैठकी होली शैली का उद्गम कुमाऊँ में राजतन्त्र के समय राजदरबारों में आने वाले शास्त्रीय संगीतज्ञों के गायन से माना जाता है. यह शैली कुछ सीमा तक ठुमरी गायन शैली से मिलती है, परन्तु समय के साथ इसमें घुले स्थानीय लोक तत्व इसे एक भिन्न गायन शैली बनाते हैं. बैठिकी होली 16 मात्रा के चांचार ताल में गायी जाती है जो जतताल का ही एक प्रकार है. बैठकी होली काफी, खमाज, कल्याण, जंगला काफी, बिहाग, दरबारी आदि रागों में गायी जाती हैं. सामान्य जनमानस के द्वारा गाएं जाने के फलस्वरूप इस विधा में रागों की पूर्ण शुद्धता नहीं बरती जाती. होली गीतों के काव्य की विषयवस्तु मुख्यतः आध्यात्म, भगवत भजन, कृष्ण लीलाएं, रामायण व महाभारत के प्रसंग, प्रेम, हास- परिहास तथा चंचल टीका-टिप्पणियाँ होती है. अधिकाँश बैठकी होलियों का काव्य खड़ी बोली व कुछ खड़ी होलियों का काव्य कुमाऊँनी में है. होली की इस परम्परा के कारण विरासत के रूप में मिली सांगीतिक समझ लोगों को शुद्ध शास्त्रीय संगीत सीखने में सहायता करती है तथा उन्हें शास्त्रीय संगीत का अच्छा श्रोता भी बनाती है. प्रस्तुत लेख में कुमाऊँ की होली गायन शैली के साहित्यिक व सांगीतिक पक्ष की चर्चा की गयी है साथ यह लेख स्थानीय लोक भाषा व उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की झलक भी प्रस्तुत करता है.
Joshi, Ravi. "(Kumayun ki Holi Gayan Shaili: Ek Vishleshanatmak Addhyayan) कुमाऊँ की होली गायन शैली: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन." Sangeet Galaxy, vol. 12, no. 2, July 2023, pp. 145-153.