प्राचीन ग्रन्थों में भरत कृत नाट्यशास्त्र सबसे प्रमुख ग्रन्थ माना गया है । जिसका रचना काल तीसरी शताब्दी माना गया है । नाट्यशास्त्र के 37 अध्याय है जिसमें 28 से 33 संगीत से सम्बन्धित है। उस समय जो वाद्य प्रचलित थे उनका वैज्ञानिक ढं़ग से अध्ययन किया गया है । महर्षि भरत ने 28 वें अध्याय का प्रारम्भ वाद्यों के वर्गीकरण से किया है। वाद्यों को चार भागो में विभाजित करते हुए उनके नाम, गुण, निर्माण विधि तथा वादन प्रक्रिया एवं वादन सामग्री का वर्णन किया है । अवनद्ध वाद्य को दो वर्गो में विभाजित किया है - अंग , प्रत्यंग । अंग - वे वाद्य जिनको किसी स्वर में मिलाया जा सकता है, जिसके अन्तर्गत त्रिपुष्कर , पणव , दर्दुर। प्रत्यंग - वे वाद्य जिनको किसी स्वर में नहीं मिलाया जा सकता है, जिसके अन्तर्गत झल्लरी , पटह।
नाट्यशास्त्र में जिन वाद्यों का वर्णन है वो लुप्त नहीं हुए है, वो आज भी लोक एवं शास्त्रीय रुप में विद्यमान है । त्रिपुष्कर के तीन भाग आंकिक जो कि उत्तर भारत में पखावज तथा दक्षिण भारत में मृंदग के रुप में जाना जाने लगा एवं उर्ध्वक, आंलिग्य जो कि तबले के रुप में विकसित हुआ। भरत कालीन पणव पूर्व मध्य काल में हुडुक, मध्य युग में आवज तथा आधुनिक युग में हुडुक या हुडुका कहा जाने लगा । दर्दुर वर्तमान में घट के समान है इसे दक्षिण भारत में घटम् कहा जाता है । झल्लरी को वर्तमान में खंजरी, चंग, दायरा के नाम से पुकारा जाता है । पटह को ढोल के नाम से जाना जाता है ।
इस प्रकार वर्तमान में जो भी वाद्य प्रचलित है उनका इतिहास देखा जाये तो वे सभी वाद्य कहीं न कहीं भरत कालीन वाद्य के समान प्रतीत होते है।
Mishra, Kavita. "Natyashastra me Varnit Ang Pratyang Avnaddhya Vadya Evam Unka Vartman Swaroop." Sangeet Galaxy, July 2015, pp. 19-29.