मानव और संगीत का सम्बन्ध अनादि काल से चला आ रहा हैं। अन्य ललित कलाओं की अपेक्षा संगीत मे मनोमग्ध करने की शक्ति अधिक है। मन की चंचल वृत्तियाँ संगीत के प्रभाव से रस मग्न होकर केवल श्रवण शक्ति में ही केन्द्रीभूत हो जाती है। अतः मन के नियत्रंण के लिए धर्माचार्याें ने संगीत का भक्ति के साथ संयोग कर दिया जो कालान्तर में भजन एवं संकीर्तन के नामों से प्रसिद्ध हुआ।
वैष्णव धर्म एवं दर्शन के चार प्रसिद्ध सम्प्रदाय है - सनक सम्प्रदाय (निम्बार्क सम्प्रदाय), श्री सम्प्रदाय, ब्रह्म सम्प्रदाय तथा रूद्र सम्प्रदाय है। इन सभी सम्प्रदायों के अधिष्ठाता भगवान विष्णुवासुदेव ही है। भगवान के हंसावतार के रूप में सनक सम्प्रदाय उत्पन्न हुआ। श्री निम्बार्काचार्य इस मत के प्रधान प्रवर्तक थे। जिनसे सनक सम्प्रदाय ही निम्बार्क सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनका दार्शनिक सिद्धान्त द्वैताद्वैत अथवा भेदा भेद के नाम से प्रसिद्ध है। इनका मानना था कि ब्रह्म अद्वैत और द्वैत (द्वैताद्वैत) दोनों ही है। जीव और ब्रह्म के बीच सम्बन्ध है, जो अंशाशि भाव से अंश और अंशी के बीच होता है। अपने अस्तित्व और क्रिया के लिए जीवात्मा की स्वतंत्र सत्ता नही है। इसके लिए जीव ईश्वराधीन रहते है।
Shukla, Gourav. "Nimbark Sampraday ke Utsavo me Lok Nritya ki Pratha." Sangeet Galaxy, January 2016, pp. 22-24.