Nritya – Krishna Bhakti Kavya ke Sandarbh me

Abstract

भारतीय परम्परा में भगवान शंकर को नृत्य का आदि प्रवर्त्तक माना गया है। वे नित्य प्रति संध्या काल में आनंदित होकर घूमते हुए नृत्य करते हैं। इस आनन्द नर्तन में सभी सम्मिलित होते हैं। उसकी विराटता में ब्रह्मा जी ताल देते हैं, विष्णु जी मृदंग बजाते हैं, सरस्वती अपनी वीणा का वादन करती हैं, सूर्य और चन्द्र वंशी (बाँसुरी) वादन करते हैं, अप्सरायें व किन्नरियाँ श्रुतियों का ध्यान रखती हैं, नन्दी और भृंगी डमरू तथा मादल बजाते हैं। इसके साथ नारद स्वर मिलाते हैं।‘‘शिवजी के पदाघातों से पृथ्वी और हस्त संचालन से नक्षत्र-मण्डल गतिमान होता है। इसीलिए कहा गया है कि ‘नृत्यमयं जगत्’ अर्थात् यह समस्त संसार ही नृत्यमय है।’’

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Citation

Gupta, Preeti. "Nritya – Krishna Bhakti Kavya ke Sandarbh me." Sangeet Galaxy, October 2013, pp. 2-7.

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