15 अगस्त 1920 को उ0प्र0 के द ेवरिया जनपद के ग्राम मझा ैली में स्वामी जी का जन्म हुआ। जय
मृद ंग का घोष करन े वाले स्वामी पागलदास मात्र नौ महीन े की स्कूली शिक्षा क े बावज ूद सुयोग्य
शिक्षक, परीक्षक, वादक, विजिटि ंग फैलो तथा व्याख्याता के साथ साथ अन ुभवी लेखक भी थ े।
आपकी पुस्तके म ृद ंग तबला प्रभाकर दो भागा ें में तथा तबला कौम ुदी तीन भागो ं में प्रकाशित हा े
चुकी ह ै तथा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में म ृद ंग अंक सहित कई शोध-परक लेख प ्रकाशित हुए है ं।
पखावज को 21 वीं शताब्दी का लोकप्रिय वाद्य बनान े ह ेत ु वह प्राणपण से ज ुट े थे उनका
कहना था-कि यह पखावज कलाकार कार्यक्रम कर लें जनता का मना ेर ंजन कर लें, पैसा कमा ल े ं
लेकिन पखावज का विकास या ता े मेर े द्वारा होगा या मेर े शिष्या ें द्वारा क्योंकि मात्र पखावज बजा
लेन े से ही पखावज का भला नहीं हा ेन े वाला ह ै। पखावज के विकास के लिए जिस सोंच की
आवश्यकता है जिस रचनात्मक ऊर्जा की आवश्यकता होती है वह मेर े पास ह ै आ ैर मैं उस े बिना
किसी कृपणता के अपन े शिष्यों को द े रहा हूँ।
Jouhari, Seema. "Pakhawaj me Pragtishilta ke Paksh-dhar Swami Pagal Das." Sangeet Galaxy, July 2014, pp. 43-48.