भारतीय धर्म एवं संस्कृति के विकास में पश्चिम बंगाल का विशेष योगदान रहा है. भारतीय चिंतन की अनेक ज्ञानदायिनी धाराओं का प्रस्फुटन भी यही से हुआ है. संगीत सर्वदा ही संस्कृति का संगी रहा है और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भागों के ‘भवइया’ लोक संगीत यहाँ के राजवंशी लोगों की संस्कृति की धरोहर है. ये संगीत उतने ही प्राचीन एवं अनादी है जितना की मानव जाति. कंठ मानव की सहज एवं स्वभाविक देन है, और यही उसके गीत तथा वाद्यों का निर्माण एवं उसके स्वर क्षेत्र को निर्धारित करता है.
भवइया गीत का उदगम स्थल कूचबिहार जिला होने के कारण इस लेख में कूचबिहार व उसके आस-पास वाले अंचलों के विवरण को शामिल किया जाएगा. ‘कूचबिहार’ भारतवर्ष में पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग (बंगाल और बिहार का सीमा क्षेत्र) में स्थित है. यह राज्य शाही रियासत का अवशेष है. अतः मैं वहाँ के राज परिवार और प्राचीन ‘कोच राजवंशी’ के इतिहास को भी यहाँ आलोचना करने का प्रयत्न करूंगी क्योंकि ‘भवइया के साथ इस राज परिवार का एक गहरा सम्पर्क रहा.
भवइया गायन शैली का सम्बन्ध देशी संगीत से है. इस गायन शैली के कई प्रकार भी हैं, जिसका पूर्ण परिचय भी उदाहरण के साथ दिया जाएगा. गीतों के धुनें प्रायः इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, भाषा, रहन-सहन, पशु-पक्षी एवं आचार-विचार व व्यवहार, वाद्य यंत्र आदि के आधार पर बनी हुई होने के कारण उन सभी विषयों का उल्लेख भी यहाँ किया जाएगा. सर्वपरि प्राचीन समय से लेकर आजतक इस गीत शैली में जो जो परिवर्तन तथा उन्नत साधन हुआ है, उसका विवरण तथा वर्तमान समय के कुछ गायक/गायिकाओं का नाम भी इस लेखनी में उल्लेखित करने का प्रयास किया जाएगा.
Kar, Amita and Sujit Devghariya. "Pashchim Bangal ka Lok Sangeet – Bhavaiya evam Usaki Vartman Paristhiti." Sangeet Galaxy, vol. 9, no. 2, July 2020, pp. 57-65.