हमारा देश भारत विश्व का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश है। यह अपनी गौरवशाली परंपरा और सार्वभौम मानदण्डो के कारण विशाल माना जाता है न कि अपने विशाल भू-भाग या विराट जनसंख्या के कारण। उदारता, सहिष्णुता, चिंतन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इन गुणों के कारण ही परिलक्षित होती है। वेशभूषा, भाषा, आचार विचार व धर्म की विविधता को राष्ट्र्ीय एकता के सूत्र में पिरोकर चलना सहज नहीं है, लेकिन भारत ने इसे युगों से अपनाया है और व्यवहार में उतारा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा जगन्नाथपुरी से द्वारकापुरी तक यह विशाल भारत भावना के ऐसे सूक्ष्म धागों से बंधा है कि कहीं एकतार छेडने से सारा राष्ट्र स्पंदित हो उठता है। करोड़ांे दिल एक साथ धड़कने लगते हैं। इस एकता को खंडित करने के लिए कुछ विस्फोटक शब्दों का निर्माण हमारी राजव्यवस्था के द्वारा किया जाता रहा है ऐसा ही एक शब्द साम्प्रदायिक है, जिसकी गूंज आज चारों अर सुनायी दे रही है। प्रायः धर्म और सम्प्रदाय को समझने में हम भूल कर बैठे हैं क्योंकि धर्म धारण करने की वस्तु है और सम्प्रदाय अनुकरण की। भारतीय धर्म सिद्वांत में जिस धर्म की बात की गयी है वह वास्तव में मानव धर्म है न कि साम्प्रदायिक मत। इसलिए भारत के सभी धर्मो में एक ब्रम्ह और उससे उत्पन्न अनेकांे जीवों की अवधारणा प्राप्त होती है, जो वास्तव में प्रकारान्तर से साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रत्यक्षीकरण है।
Ghokhale, Roopali, Santosh Pur, are, and Deepak kumar Mittal. "Sampradayik Sadbhav Evam Samajik Vikas me Sangeet ki Bhumika." Sangeet Galaxy, October 2013, pp. 15-19.