मध्यकालीन सांगीतिक ग्रंथों में संगीत रत्नाकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसकी रचना शारंगदेव द्वारा १३वीं शताब्दी में की गई है. यह ग्रंथ सात अध्यायों में विभक्त हैं. इसके छठे अध्याय वाद्याध्याय में वाद्यों का विधिवत् वर्णन किया और वाद्यों को केवल बजाने वाले यन्त्र विशेष रूप में में ही नहीं वरन् अलग - अलग स्थानों पर अलग अलग अर्थों से प्रयोग में लाए। जैसा कि वर्तमान काल में वाद्य का तात्पर्य उन यंत्रों से ली जाती हैं जिनमें सांगीतिक ध्वनियां निकाला संभव हो, वैसे ही शारंग देव ने वाद्य को तीन अलग अर्थों में प्रयोग किया जिसमे उन्होंने बजने वाला, उन यंत्रों पर बजने वाली रचनाएं को वाद्य तथा वाद्यों पर बजने वाले प्रबंध को वाद्य प्रबंध शब्द से ही संबोधित किया है. शोध प्रपत्र के विषय के लिए वाद्याध्याय के चार प्रकार के वाद्य यंत्र, सुषिर व अवनद्ध वाद्यों की रचनाओं ( वाद्यों) को, तथा उनके वाद्य प्रबंध को लिया है.
Mahendra, Keerti and Renu Johri. "Sangeet Ratnakar me Vibhinn Arthon me Prayukta ‘Vadya’ Shabda ki Vyakhya (संगीत रत्नाकर में विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त ‘वाद्य’ शब्द की व्याख्या)." Sangeet Galaxy, vol. 12, no. 1, pp. 148-153.