एक लम्बे सम तक दिल्ली संगीत का केन्द्र रहा है, जिसके फलस्वरूप दिल्ली में दीर्घकाल तक तबला वादन की कला भी भली प्रकार फलती-फूलती रही है. कुछ समय के बाद धीरे-धीरे तबले का प्रचार उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले में भी होने लगा. इन जिलों में लखनऊ का नाम सर्वप्रथम आता है जहां तबले का आगमन हुआ. चूंकि भौगोलिक दृष्टि से यह दिल्ली के पूर्व की ओर स्थित है. अतः इस घराने को पूरब का घराना और उसकी वादन शैली को पूरब बाज कहा गया. लखनऊ उस समय नवाबी सल्तनत अवध की राजधानी थी. नवाबी शान-शौकत के कारण लखनऊ के नवाब तथा रईस लोग संगीत के बहुत प्रेमी थे. संगीत तथा संगीतज्ञों का वहाँ बहुत ही मान-सम्मान होता था जिसके फलस्वरूप भारत के विभिन्न नगरों मुख्य रूप से दिल्ली से अनेक संगीतज्ञ कलाकार लखनऊ में आकर बस गए. इनमें से जो विशेष प्रतिभा-सम्पन्न कलाकार थे उनको लखनऊ का राज्याश्रय प्राप्त हो गया. नवाब आसिफुद्दौला के शासनकाल सन् 1775 से सन् 1795 में ही तबला दिल्ली से लखनऊ आया. नवाब आसिफुद्दौला के शासन काल में ही उ0 मोदू खाँ और उ0 बख्शू खाँ लखनऊ आये और अपने प्रयत्नों से लखनऊ में भी तबले की कला को भली-भांति विकसित किया. प्रस्तुत लेख तबले के लखनऊ घराने के विकास और उसकी वादन शैली की विशेषताओं को रेखांकित करने का प्रयास करता है.
Nahar, Shobhit Kumar and Prem Prakash Prajapati. "(Tabla ka Lucknow Gharana Evam Vadan Shaili ki Visheshtaien) तबले का लखनऊ घराना एवं वादन शैली की विशेषता." Sangeet Galaxy, vol. 12, no. 2, July 2023, pp. 154-158.