रागदारी संगीत में बन्दिशों का विशिष्ट स्थान है जो राग को मूर्त रूप प्रदान करती है। ऐसा देखा गया है कि कुछ राग उत्कृष्ट रचनाओं के अभाव में लुप्तप्राय हो गये हैं। अतः राग के रूप को स्थायित्व प्रदान करने का दायित्व ‘वाग्येयकार‘ का है।
विभिन्न काल में देश की परिस्थिति व समय के बदलाव के चलते कवि, सन्त, रचनाकारों ने शास्त्रीय संगीत के अनुरूप बन्दिशों की रचना कम से कम शब्दों का चयन करके किया। यद्यपि राग स्वयं में सम्पूर्ण है तथापि गायन को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त बन्दिश ही करती है।
प्राचीन काल से लेकर आज तक जिस प्रकार संगीत के अन्य क्षेत्रो में परिवर्तन हुए, ठीक उसी प्रकार गीत रचनाओं पर भी सामाजिक प्रवृत्तियों, व्यवहार, आवश्यकता, रीति-रिवाज आदि का गहरा प्रभाव पड़ा।
स्वर और शब्द से निर्मित तालबद्ध कलात्मक रचना को बन्दिश कहते हैं। बन्दिश एक ऐसा रेखाचित्र है, जिसे ध्यान में रखते हुए गाकर कलाकार अपनी कल्पना, विचार और प्रतिभा से विभिन्न प्रकार के रंग भर देता है। अतः सौन्दर्य को विविध रूपों में प्रदर्शित करने के लिए शास्त्रीय संगीत में ‘बन्दिश‘ ‘चीज़‘ का विधान किया गया है जिसे ‘निबद्ध‘ के अन्तर्गत माना गया।
Chourasiya, Amrita. "Uttar Bhartiya Sangeet Me Bandish." Sangeet Galaxy, January 2015, pp. 45-49.