यह लेख डिडिटल युग मेंभारतीय शास्त्रीय संगीत की डथिडत, चनुौडतयों औरनवाचारों का समग्र डवश्लेषण प्रथतुत करता
है.पारंपररक गुरु-डशष्य परंपरा मेंडवकडसत यह संगीत परंपरा अब डिडिटलीकरण, आडटिडिडशयल इटं ेडलिेंस, वचिअु ल
ररयडलटी और थरीडमंग तकनीकों के माध्यम सेएक नए वैडिक आयाम मेंप्रवेश कर चकु ी ह.ै लेख में डिखाया गया है
डक कैसेडिडिटल माध्यमोंनेन केवल िुलिभ रचनाओंकेसंरक्षण को संभव बनायाह, ैबडकक संगीत की डशक्षा, प्रथतुडत
और डवतरण केथवरूप को भी क्ांडतकारी रूप सेबिलाहै. साि ही, यह लेख उन सामाडिक, आडििक और सांथकृडतक
सवालों को भी उठाता है िो तकनीकी डवकास के साि सामने आए हैं. डनष्कषितः, यह शोध यहइडंगत करताहै डक यडि
संतुलन और मूकयों की रक्षा के साि तकनीक को अपनाया िाए, तो शास्त्रीय संगीत वैडिक मंच पर एक सशक्त
सांथकृडतक धरोहर केरूप मेंउभर सकताह.ै
उद्धव, नितिश भारद्वाज और प्रो० प्रवीण. "डिजिटल युग में शास्त्रीय संगीत: संरक्षण और नवाचार की नई राह." Sangeet Galaxy, vol. 14, no. 2, 2025, pp. 268-276.