भारतीय संगीत में राग और रस की अवधारणा केवल कलात्मक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह आत्मबोध और सामूहिक अनुभव का विषय है. राग साधना कलाकार को आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाती है और वही अनुभव श्रोता तक पहुँचकर सामूहिक अनुनाद का रूप लेता है. नाट्यशास्त्र में वर्णित रस सिद्धांत संगीत में जीवंत होता है, जहाँ अलंकरण और विशिष्ट रूप से लिया हुआ स्वरक्रम भावनाओं को जागृत कर श्रोता को अलग दुनिया में ले जाता है. शास्त्रीय संगीत के विभिन्न घरानों ने इस परंपरा को गहराई दी है, जबकि आधुनिक संदर्भ में डिजिटल माध्यमों ने इसे वैश्विक स्तर पर पहुँचाया है. इस शोध पत्र का उद्देश्य आत्मबोध से सामूहिक अनुनाद तक राग और रस की यात्रा को समझना है.
Thatte, Anaya. "रागानुभूति का आधार – रस संकल्पना." Sangeet Galaxy 15, no. 2 (2026): 84-93.