अमित यादव (शोधार्थी)
प्रो. अलका नागपाल (शोध निर्देशिका)
संगीत एवं ललित कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
Email: ayadav@mfa.du.ac.in
सारांश
सारंगी वाद्य भारतीय संगीत को समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है. हिंदी फ़िल्म संगीत में सारंगी सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला वाद्य यंत्र है जो गीतों को और भी उत्कृष्ट बनाता है. भारतीय संगीत में अन्य वाद्यों की तुलना में यह एक बहुत ही कठिन और विशिष्ट वाद्य है. फ़िल्म संगीत में सारंगी वादन के कुछ बेहतरीन संगीतकारों में सुल्तान खान, पं. रामनारायण, मुराद अली, दिलशाद खान, साबिर खान, मोमिन खान आदि के नाम शामिल हैं. इन सभी कलाकारों ने खूबसूरत धुनों के साथ सारंगी का बेजोड़ वादन किया है और फ़िल्मी संगीत को और भी सुंदर बनाया. प्रस्तुत शोध पत्र हिंदी फ़िल्म संगीत में सारंगी के प्रयोग और विभिन्न सारंगी वादकों द्वारा सृजित बेहतरीन संगीत के योगदान को रेखांकित करता है.
महत्वपूर्ण शब्द – सारंगी, फ़िल्मी गीत, सुल्तान खान, पं. रामनारायण, मदनमोहन, हिंदी फ़िल्म
परिचय – भारतीय शास्त्रीय संगीत में सारंगी एक गायकी प्रधान वाद्य है. जिसका प्रयोग एकल अथवा सहायक वाद्य के तौर पर किया जाता है. प्राचीन समय में सारंगी घुमक्कड़ जातियों का वाद्य हुआ करता था. इसका प्राचीन नाम सारिंदा था, जिसे आधुनिक समय में सारंगी के नाम से जानते है. सारंगी से सौ प्रकार की धुनें निकाली जा सकती है इसीलिए इसे ‘सौ रंगी’ भी कहा जाता है. यह एकमात्र ऐसा साज़ है जो दिल के करीब रखकर बजाया जाता है जो सीधे सुनने वाले के दिल को छूता है. सारंगी का सबसे विशेष गुण है उसकी मधुर आवाज़. सारंगी की शांत, मधुर, रोमांचक और धुन लोगों को अपनी ओर सहज ही आकर्षित करती है. फ़िल्मी गीतों में सारंगी का उपयोग प्रायः संगीत की उस खासियत को बताने के लिए किया जाता है जो संगीत के उत्साहित करने वाले भाव और भावनाओं को बढ़ाती हैं. इसके अलावा सारंगी का प्रयोग दुख, विषाद, हताशा आदि भावों को अभिव्यक्त करने में भी किया जाता है. इससे संगीत की उस अन्तर्निहित शक्ति का अनुभव होता है जो अन्य वाद्यों से प्राप्त नहीं होती है. कई पुरानी फ़िल्मों में सारंगी का प्रयोग किया गया है. यहाँ कुछ उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम दिए जा रहे हैं जिनमें सारंगी का प्रयोग हुआ है:
- अदालत” (1958) – “उनको ये शिकायत है”
- मुगल-ए-आजम (1960) – “बेकस पे कर्म कीजिये”
- गंगाजमुना (1961) – नैन लड़ जाई रे
- कश्मीर की कली (1964) – दीवाना हुआ बादल
- उमराव जान (1981) – जिंदगी जब तेरी बज्म में लाती है मुझे
- देवदास (2002) – बैरी पिया”
इसके अलावा भी बहुत सी हिंदी फ़िल्मों में सारंगी वाद्य का प्रयोग हुआ है.
एक अच्छे उदाहरण के रूप में, फ़िल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में “सलाम-ए-इश्क़” गीत में सारंगी का उपयोग हुआ है जो इस गीत की अनूठी शैली को बताता है. अन्य उदाहरणों में, “अलबेला साजन आयो” गीत में भी सारंगी का प्रयोग हुआ है जो इस गीत की गम्भीरता को और भी गहरा बनाता है. इसके अलावा, फ़िल्म हमदर्द में “तोरे नैना रसीले” गीत में सारंगी का उपयोग हुआ है जो गीत को एक अलग रूप देता है. संगीतकार मदन मोहन ने अपनी फ़िल्मों में सारंगी का बहुत इस्तेमाल किया है. 1958 में आई फ़िल्म ‘अदालत’ का गीत ‘यूं हसरतों के दाग़, मोहब्बत में धो लिए’ 1 में उस्ताद रईस ख़ान के सितार के अलावा सारंगी का भी बहुत सुंदर प्रयोग किया गया है. दत्ताराम ने भी फ़िल्म ‘परवरिश’ (1958) के लिए भी ऐसा ही नग़मा सारंगी के साथ रचा था. मुकेश की आवाज़ में इस फ़िल्म का गीत ‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें कोई उनसे कह दे, हमें भूल जाएं’ को कोई कैसे भूल सकता है. फ़िल्म ‘हीरो’ (1983) में बांसुरी की धुन बहुत पसंद की गई. वैसे तो ‘लावारिस’ (1981) के गीत ‘अपनी तो जैसे तैसे’ गीत में डफली सुनाई दी थी. फ़िल्म ‘सरगम’ (1979) के कई गीतों में डफली और घुंघरू सुनाई दिए, पर बाद में ऐसे गीत नहीं बने! इसे फ़िल्मों के कथानक की कमजोरी कहा जाए या संगीतकारों की प्रयोगधर्मिता- जो भी हो, लेकिन फ़िल्मी गीतों से देसी वाद्य यंत्र एक तरह से विदा हो गए.2
हिंदी फ़िल्मों में सारंगी वाद्य का प्रयोग अनेक कलाकारों द्वारा किया गया है. यहां कुछ प्रसिद्ध सारंगी वादकों के नाम दिए गए हैं जिन्होंने हिंदी फ़िल्मों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है :
1. सुल्तान खान
2. रामनारायण
3. मुराद अली
4. साबिर खान
5. दिलशाद खान
इन कलाकारों के अलावा भी बहुत से सारंगी वादक हैं जो हिंदी फ़िल्मों में सारंगी की मधुर ध्वनि के वादन में अपनी भूमिका निभाते रहे है.
सारंगी की धुन मधुर और विवर्तनशील होती है जो सुनने वाले को एक आकर्षक अनुभव देती है. सारंगी की आवाज़ में एक शांत लय होता है जो सुनने वाले के मन को अपनी ओर आकर्षित करती है और उसे आत्मीयता का अनुभव प्रदान करती है. इसके साथ ही, सारंगी की मधुर ध्वनि में भावुकता भी होती है जो उसको जीवंतता प्रदान करती है.
विभिन्न सारंगी वादकों का फ़िल्मों में योगदान:
उस्ताद सुल्तान खान –
उस्ताद सुल्तान खान का पहला और आखिरी प्यार सारंगी बजाना था. राजस्थान के सीकर में जन्में सुल्तान का ताल्लुक जोधपुर घराने से था. भारत में सारंगी को नई पहचान दिलाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. देश और दुनिया के हर बड़े कलाकार के साथ उन्होने फारफॉर्म किया. पंडित रवि शंकर, तबला वादक जाकिर हुसैन, उस्ताद आमिर खान जैसे कलाकारों के साथ संगत की और अपनी कला का प्रदर्शन कर लोगों को अपना दीवाना बनाया.3 हॉलीवुड के मशहूर निर्माता रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म गांधी में भी उन्होने सारंगी बजाई.
उस्ताद सुल्तान खान ने बहुत सी फ़िल्मों में सारंगी का वादन किया है. कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं :
1. चुपके चुपके चल रे पुरबिया – चुपके चुपके (1975)
2. अलबेला साजन आयो – हम दिल दे चुके सनम (1999)
3. जिंदगी जब तेरी बज्म में लाती है मुझे – उमराव जान (1981)
4. ये क्या जगह है दोस्तों – उमराव जान (1981)
5. आओ मिले चले – जब वी मेट (2007)
6. प्रेम की वर्षा – अग्नि वर्षा (2002)
7. आँखों से ख्वाब रुठ कर – सुपरस्टार (2008)
8. हीरे मोतियों से पहले मुझें तोल – कब्जा (1988)
9. सलाम-ए-इश्क़ – मुकद्दर का सिकंदर (1978)
इसके अलावा भी कई और फ़िल्मों में उस्ताद सुल्तान खान ने सारंगी का वादन किया है.
पं. रामनारायण जी –
पं० जी का जन्म- 25 दिसंबर, 1927 को उदयपुर, राजस्थान में हुआ. पं० जी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार हैं जो गज (कमानी वाला) सारंगी बजाते हैं. उन्हें सारंगी को एक एकल शास्त्रीय वाद्य के रूप में प्रसिद्ध करने का श्रेय जाता है. राम नारायण जी का परिवार एक लंबे समय से दरबारी संगीतकारों से संबंध रखता है. उन्होंने अपना आरंभिक प्रशिक्षण अपने पिता से लिया.4
पं. रामनारायण जी ने कई फ़िल्मी गीतों में सारंगी का वादन किया है. जैसे अदालत, गंगा जमुना, हमदर्द, कश्मीर की कली, मधुमती, मिलन, मुगल-ए-आजम, नूरजहां आदि. कुछ प्रमुख फ़िल्म एवं उनके गीतों के उदाहरण निम्नलिखित हैं :
1. उनको ये शिकायत है – अदालत (1958)
2. यूं हसरतों के दाग – अदालत (1958)
3. जा जा रे साजना – अदालत (1958)
4. नैन लड़ जाइन्हे – गंगा जमुना (1961)
5. दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे – गंगा जमुना (1961)
6. ऋतु आये ऋतु जाए – हमदर्द (1953)
7. ओ घायल करते है खुद ही – हमदर्द (1953)
8. तोरे नैना रसीले – हमदर्द (1953)
9. पी बिन सूना री – हमदर्द (1953)
10. दीवाना हुआ बादल – कश्मीर की कली (1964)
11. हम हाल ए दिल सुनाएंगे – मधुमती (1958)
12. मेरा क़िस्सा-ए-गम किसी से ना कहना – नूर जहां (1967)
13. मोहब्बत हो गयी है – नूर जहां (1967)
14. रात की महफ़िल सूनी सूनी – नूर जहां (1967)
15. मोहब्बत की झूठी कहानी – मुगल-ए-आजम (1960)
16. बेकस पे कर्म कीजिये – मुग़ल-ए-आज़म (1960)
17. जब रात है ऐसी मतवाली – मुग़ल-ए-आज़म (1960)
18. ए इश्क़ ये सब दुनिया वाले – मुग़ल-ए-आज़म (1960)
19. ख़ुदा निगेहबान हो तुम्हारा – मुग़ल-ए-आज़म (1960)
इसके अलावा भी अनेक फ़िल्मों में पं. रामनारायण जी ने सारंगी का वादन किया है.
संगीतकार सर्वश्री नौशाद अली ने मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म को संगीत से संवारा है. इसमें शास्त्रीय संगीत का सुन्दर प्रयोग कर, चित्रपट के गीत-संगीत को अविस्मरणीय बनाया. प्रत्येक रचना अपने में संगीत की पुरी दुनिया समेटे हुए है. ऐतिहासिक चित्रपट का गीत-संगीत भी ऐतिहासिक हो गया. इस फ़िल्म के सदाबहार शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत उपरिलिखित हैं.5
मुराद अली –
मूल रूप से मुरादाबाद के संगीतकारों के परिवार में जन्मे मुराद अली छठी पीढ़ी के सारंगी वादक हैं. उन्होंने अपने दादा उस्ताद सिद्दीकी अहमद खान और पिता उस्ताद गुलाम साबिर खान के अधीन गहन प्रशिक्षण लिया. वर्तमान में उन्हें युवा पीढ़ी के अग्रणी सारंगी वादकों में से एक माना जाता है.6
मुराद अली ने भी फ़िल्मों में सारंगी वादन किया है. कुछ फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं :
1. खामोश पानी
2. खोया खोया चाँद (संगीत निर्देशक शांतनु मोइत्रा)
3. वंदे मातरम – लगे रहो मुन्ना भाई (2006)
4. “एही ठइया मोतिया” – लागा चुनरी में दाग (2007)
इसके अलावा मुराद अली ने धारावाहिक ‘हम परदेशी हो गए’ के साथ अनेक अल्बम जैसे आह, बंदिश ग्रुप, नाची सारी रात, दाग, जहां-ए-ख़ुसरो, लकीरें, मुक्ता, कोशिश, आंख, अब के सावन, धरोहर आदि में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.7
साबिर खान –
उस्ताद साबिर खान का जन्म जोधपुर राजस्थान में हुआ था. संगीत के सीकर घराने से ताल्लुक रखते हैं, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को कई दिग्गज दिए हैं. अपने खानदान में सारंगी की तालीम लेने वाले वे नौवीं पीढ़ी के कलाकार है. उनके परदादा उस्ताद अजीम खान साहब सीकर राजस्थान के दरबारी संगीतकार थे. उन्होंने अपने पिता विश्व प्रसिद्ध सारंगी वादक और गायक उस्ताद सुल्तान खान साहब से प्रशिक्षण लिया.8
उस्ताद साबिर खान ने कई फ़िल्मों में सारंगी वादन किया है. इनमें से कुछ फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं :
1. इश्क में रुसवा – डेंजरस इश्क़ (2012)
2. ओ रे पिया – आजा नचले (2007)
3. एक दिल एक जान – पद्मावती (2017)
4. लाल इश्क़ – गोलियों की रासलीला रामलीला (2013)
5. मोहे रंग दो लाल – बाजीराव मस्तानी (2015)
6. आजा नच ले – आजा नच ले (2007)
दिलशाद खान –
दिलशाद खान का जन्म 1983 में जोधपुर, राजस्थान में हुआ था. वह संगीत के सीकर घराने से ताल्लुक रखते हैं, जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को कई दिग्गज दिए हैं. अपने खानदान में सारंगी की तालीम लेने वाले वे नौवीं पीढ़ी के कलाकार है. उनके परदादा उस्ताद अजीम खान राजस्थान के सीकर में दरबारी संगीतकार थे.9 दिलशाद खान बॉलीवुड संगीत उद्योग में भी एक प्रसिद्ध नाम है. उन्होंने देवदास, नमस्ते लंदन, मोहब्बतें, गोल, रॉकस्टार, फालतू, मौसम, गुजारिश, झूम बराबर झूम, क्योंकि, रेड, तेरे नाम, धोबी घाट ,जैसी हिट फ़िल्मों में सारंगी वादन किया है.
1. बैरी पिया – देवदास (2002)
2. कहे छेड़ मोहे – देवदास (2002)
3. यही होता प्यार – नमस्ते लंदन (2007)
4. विरानिया – नमस्ते लंदन (2007)
5. मैं जहां रहूं – नमस्ते लंदन (2007)
6. पैरों में बंधन है – मोहब्बतें (2000)
7. मोहब्बतें लव थीम (वाद्य) – मोहब्बतें (2000)
8. बिल्लो रानी – धन धना धन गोल (2007)
9. तुम को पा ही लिया – रॉकस्टार (2011)
10. ले जा तू मुझें – फालतू (2011)
11. इक तू ही तू ही – मौसम (2011)
12. बोल ना हल्के हल्के – झूम बराबर झूम (2007)
13. आ जीले एक पल में – क्योंकि (2005)
14. क्योंकि इतना प्यार – क्योंकि (2005)
15. झटका मारे – क्योंकि (2005)
16. दिल के बदले सनम – क्योंकि (2005)
17. क्यों किसी को – तेरे नाम (2003)
18. फेरो ना नजरिया – कला (2022)
मोमिन खान –
मोमिन खान सारंगी के उभरते हुए सितारे हैं . आठ पीढ़ियों तक संगीतकारों के परिवार में जन्मे, उनके दादा उस्ताद महबूब खान को सारंगी सम्राट (सारंगी के सम्राट) के रूप में जाना जाता था. उन्होंने मोमिन के पिता उस्ताद मोइनुद्दीन खान, जयपुर के एक प्रसिद्ध गायक, ने अपने चचेरे भाई साबिर के साथ अध्ययन किया.10
मोमिन खान ने जिन फ़िल्मों में सारंगी का वादन किया है उनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं :11
- जब सैंया – गंगूबाई काठियावाड़ी (2022)
- आवारा – दबंग-3 (2019)
- देवा देवा – ब्रह्मास्त्र (2022)
- रसिया – ब्रह्मास्त्र (2022)
- मधुर कल तू – शाकुंतलम (2023)
- मिली (2022)
थोड़े कम अजनबी – पगलैट (2021)
निष्कर्ष : इस प्रकार सारंगी हिंदी फ़िल्म संगीत में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है जो अभिनेताओं के भावों को सही ढंग से व्यक्त करने में मदद करता है. यह उन अनेक उत्कृष्ट संगीतों में से एक है जिन्हें हम आज भी सुनते हैं और जो हमें भारतीय संगीत की अमूल्य विरासत के बारे में याद दिलाते हैं. संगीतकारों और सारंगी वादकों के श्रेष्ठ काम के कारण, सारंगी आज भी हिंदी फ़िल्म संगीत में अहम भूमिका निभाती है.
सारंगी एक प्राचीन भारतीय संगीत वाद्य है जो भारतीय संगीत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता रहा है. इसे हिंदी फ़िल्म संगीत में उपयोग करने की शुरुआत 1930 के दशक में हुई थी और इसके बाद संगीत में सारंगी की आवाज धीरे-धीरे बड़े पैमाने पर उपयोग की जाने लगी. हर्ष से लेकर विषाद तक की मन की विभिन्न भावनाओं की अभिव्यक्ति फ़िल्मों जितनी सहजता से सारंगी वाद्य के माध्यम से हुई है, उसके पीछे सारंगी कलाकारों की मेहनत का ही परिणाम है. एक ओर सारंगी ने फ़िल्मों को खूबसूरत संगीत से सजाया तो दूसरी ओर फ़िल्मों ने भी सारंगी की मधुर आवाज़ को आसानी से जन सामान्य तक पहुंचाया.