हरियाणा प्रदेश में अनेक प्रकार के लोक गीतों की परम्परा मिलती है. इन लोक गीतों के प्रकारों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि यहाँ के लोक गीतों में स्थानीय, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों की झलक मिलती है. राग केवल कुछ स्वरों या केवल कुछ विशेष स्वर समुदायों का ही ज्ञान नहीं है. राग के स्वरूप की निर्मित में अनेकानेक तत्व सम्मिलित हैं जो संगीत शास्त्र के नियमों, संगीत अलंकरणों, कलाकर के कला कौशल, प्रतिभा, मनः स्थिति एवम् विशिष्ट वातावरण से संबंध रखते हैं. सारांश स्वरूप कहा जा सकता है कि लोक गीतों की धुनों का स्वरात्मक एवम् विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाये तो इन लोक धुनों में किन्हीं रागों की छाया या आभास परिलक्षित होता है. हरियाणा के लोक गीतों में निहित लोक धुनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि इन लोक धुनों में कोमल रिषभ आसावरी, काफी, सिंध भैरवी, शिवरंजनी आदि रागों का आभास मिलता है तथा कुछ लोक धुनों की रचनायें पीलू, भैरवी आदि रागों में पूर्ण रूप से आबद्ध होती है.
Dhankar, Rita. "हरियाणा के लोकगीत, स्वर-लिपियाँ एवं राग (Hariyana ke Lokgeet, Swar-Lipiyan evam Raag)." Sangeet Galaxy, vol. 11, no. 2, July 2022, pp. 218-238.