Kathak Nritya Ki Rachnao Me Soundarya

Abstract

मेरे विचार से ‘‘सौंदर्य शब्द‘‘ बहुत निजी है, व्यक्तिपरक है और विचारणीय है क्योंकि यह व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है, कोई वस्तु किसी को सौदर्य से परिपूर्ण लगती है तो किसी को नहीं। कोई उस सौदर्य का रसास्वादन करना चाहता है तो कोई उस ओर देखता भी नहीं। यह शब्द जितना सुख देता है उतना ही विरोधाभास भी उत्पन्न करता है। कथक नृत्य की रचनाओं में सौंदर्य बिखरा पड़ा है। सौदर्य के किस पक्ष को लूँ और किसे छोडू़ँ यह बहुत मुश्किल है। येन केन प्रकारेण। इस बार कथक की कुछ पुरानी लोकोक्तियों को लेते हुए कथक रचनाओं में सौदर्य पर अपनी बात रखने की चेष्टा कर रही हूँ -

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Citation

Nagar, Vidhi. "Kathak Nritya Ki Rachnao Me Soundarya." Sangeet Galaxy, April 2013, pp. 1-3.

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