सार संक्षेप
सभी भारतीय विद्याओं एवं ललित कलाओं की भाँति संगीत का भी अन्तिम ध्येय ब्रह्मानन्द की प्राप्ति है. संगीत हृदयगत भावों की अभिव्यक्ति है. ‘रस’ अथवा ‘आनन्द’ भी भाव की ही उन्नत अवस्था है. यह रस (आनन्द) भावरूप में प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है. संगीत इन्हीं भावों को उद्दीप्त कर रस-परिपाक अर्थात् ब्रह्मस्वाद सहोदर आनन्द की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ व सशक्त माध्यम है. संगीत में रससृष्टि के प्रमुख अभिकरण नाद, श्रुति, स्वर, बन्दिश, ताल, लय, काकु इत्यादि हैं जिनके सम्यक् प्रयोग से श्रोता व प्रयोक्ता रस के चरमोत्कर्ष तक पहुँच जाते हैं, यह आनन्द अतीन्द्रिय है, ब्रह्मानन्द के समान है. इस आनन्द की प्राप्ति संगीत जैसी सूक्ष्म तथा दैवीय कला के माध्यम से ही सम्भव है. संगीत में इस अभौतिक आनन्द अर्थात् ‘रस’ की उपलब्धि किस प्रकारसे किनके माध्यम से तथा किस रूप में होती है. यही बताने का लघु प्रयास इस शोध प्रपत्र के माध्यम से किया गया है.
प्रस्तुत प्रपत्र शास्त्रीय ग्रन्थों के अध्ययन तथा कतिपय विद्वानों के साथ सम्बन्धित विषय पर वैचारिक मन्थन के उपरान्त निर्मित किया गया है. शोध प्रपत्र को लिखने में जो प्रविधि प्रयुक्त हुर्इ है वह ऐतिहासिक एवं दार्शनिक प्रविधि के अन्तर्गत आती है.
Mishra, Jyotirmayi and Richa Kumar. "संगीत में रसोपलब्धि: एक विवेचन (Sangeet me Rasoplabdhi: Ek Vivechan)." Sangeet Galaxy, vol. 11, no. 2, July 2022, pp. 257-268.