प्रत्यक्ष रूप से स्वरों के मान जैसा विषय गायन, वादन व नृत्य में सहयोग न कर सके लेकिन संगीत की अन्तरात्मा को पहचानने के लिए गणित द्वारा निकले परिणाम किसी भी विद्यार्थी या कलाविदो हेतु शुद्ध भोजन के समान है। जिस प्रकार स्वस्थ जीवन हेतु दूषित खान-पान हानिकारक होता है, उसी प्रकार गणित रहित विचार, संगीत के साधकों हेतु कदापि लाभदायक नहीं हो सकते। व्यवहारिक रूप से सप्तक के 7 स्वर, श्रुति श्रृंखला की 22 श्रुतियाँ सम्वादी स्वर का 13 व 9 ‘श्रुत्यान्तर’ आवृति व तार की लम्बाई, ताल के ठेके की मात्राओं के हिसाब आदि के आँकड़े, ये सभी अंग संगीत का गणित ही तो है। किसी भी विषय जब चिन्तन मनन किया जाता है, तो उस विषय से जुड़े अनेकों रहस्य स्वयं प्रकट हो जाते है। यही बात संगीत के विषय में भी लागू होती है। संगीत की आत्मा ध्वनि है, जो भौतिक विज्ञान का एक अंग है। अतः संगीत चिन्तन में विज्ञान स्वतः आ जाता है। भौतिक विज्ञान पूर्णरूपेण गणित पर आधारित है। इसलिए संगीत का ध्वनि विषय, गणित से अछूता रह ही नहीं सकता। अतः प्रस्तुत शोध पत्र में गणित के माध्यम से संगीत के स्वरों की स्थापना की प्रक्रिया का मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है.
Mishra, Shivam and Rajesh Shah. "भारतीय संगीत के इतिहास में वीणा के तार पर स्वरों की स्थापना और उनका अंकन : एक गणितीय प्रक्रिया (Bhartiya Sangeet ke Itihas me Veena ke Taar par Swaro ki Sthapna aur Unka Ankan: Ek Ganitiya Prakriya)." Sangeet Galaxy, vol. 11, no. 2, July 2022, pp. 245-256.